Sunday, March 18, 2012

अशोक आंद्रे

दर्द


दर्द बहुत गहरा होता है -


समुद्र को नापा जा सकता है


आकाश को भी प्रकाशवर्ष से


जोड़ा जा सकता है,


लेकिन दर्द-


उसकी थाह नहीं होती है,


उसकी डूब में कोई आधार नहीं मिलता ,


इसकी गहराई विशाल होती है


ये जीवन की


जड़ों के बीच


अपना स्थाई घर बना लेती है


तभी तो मनुष्य


उसे थामने की कोशिश में


ता-उम्र


उसकी गहराई में


गोता लगाता रहता है .


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10 comments:

तिलक राज कपूर said...

बहुत सही कहा आपने 'दर्द जीवन की जड़ों के बीच अपना स्थाई घर बना लेता है'।

मुस्‍कराना कुछ कठिन होता नहीं मैं जानता हूँ,
दर्द अधरों से उतर जाये तो तुम भी मान लोगे।

राजिन्दर कौर said...

भाई अशोक जी, यूं तो मैं कविताएं अधिक नहीं पढ़ती… आपकी यह दर्द वाली कविता असर कर गई मुझ पर… अच्छी लगी…

Anonymous said...

प्रिय अशोक जी ,
कविता अच्छी लगी ....सरल ...बिना अधिक रहस्यात्मक स्ट्रोक्स के ..

My reaction is as follows :

दर्द को परिभाषित कर आपने कविता के दिल को धड़कन दी है ...जैसे जीवन जड़ों को परिसिंचित करते दर्द की गुत्थी
का एक सिरा पाठकों को पकड़ा दिया हो ..
-Inder

On Mon, 19 Mar 2012 11:33:45 +0530 wrote

PRAN SHARMA said...

ASHOK JI , AAPNE SEEDHE - SAADE
SHABDON MEIN DARD KEE JO SAHEE
PARIBHASHA KEE HAI USNE KAVITA KO
CHAAR CHAAND LAGAA DIYE HAI .

anju(anu) choudhary said...

डबडबाई आँखों से न मुझे बहलाओ,जिंदगी
टूटते तारे का दर्द मैं भी जानती हूँ ,जिंदगी |...अनु

Roop Singh Chandel said...

भाई, बड़ी सहज और मन को छूने वाली कविता.

आजकल कुछ अधिक ही भावुक हो रहे हो...कभी दर्द की बात करते हो तो कभी मुद्दों की. दोनों ही कविताएं पसंद आयीं. आगे भी ऎसी ही कविताओं की अपेक्षा है तुमसे जो मन की गहराई में उतर जाएं.

चन्देल

दिनेश पारीक said...

बहुत बढ़िया,बेहतरीन करारी अच्छी प्रस्तुति,..
नवरात्र के ४दिन की आपको बहुत बहुत सुभकामनाये माँ आपके सपनो को साकार करे
आप ने अपना कीमती वकत निकल के मेरे ब्लॉग पे आये इस के लिए तहे दिल से मैं आपका शुकर गुजर हु आपका बहुत बहुत धन्यवाद्
मेरी एक नई मेरा बचपन
कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: मेरा बचपन:
http://vangaydinesh.blogspot.in/2012/03/blog-post_23.html
दिनेश पारीक

सुधाकल्प said...

हर इंसान का दर्द इस कविता से जुड़ा है ,तभी एक -एक शब्द हृदय में उतर गया |

डॉ. जेन्नी शबनम said...

दर्द की गहराई नापता हर इंसान और गहरे दर्द में उतरता जाता है, जीवन भी शायद यही है. बहुत अर्थपूर्ण रचना, शुभकामनाएँ.

दिनेश शर्मा said...

Sundar!