Sunday, June 1, 2014

अशोक आंद्रे

सपनें

 कितने सपने लेता है आदमी
सारे रिश्ते
सपनों के करीब
झिलमिलाते हैं उसके
कहते हैं कि सपने
आसमान से आते हैं
लेकिन आदमी चला जाता है इक दिन
और सपने नीचे रह जाते हैं
आखिर सपने साथ क्यों नहीं जाते ?
उन सपनों का क्या करे जो
पीछे रह जाते हैं,
क्योंकि वे तो
सर्वनाम बन कर जीने लगते हैं.
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यादें
मेरे चारों ओर
यादों को समेटे
सूखे पत्तों का अंबार लगा हुआ है
और मैं अपनी बेवकूफी से
उन पत्तों पर पैर रख कर
अपनी यादों की चिंदी-चिंदी कर बैठता हूँ
शायद यही नियति होती है
उस सत्य की
जिसे सदियों से हम
पालते पोसते रहे हैं.
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भूखे पेट
ये कैसा दृश्य है
दीया तो मंदिर में जलता है
लेकिन अँधेरा
घर में फैलता है
आदमी है कि
गीत प्रभु के गाता है
दूर कहीं भूखे पेट
बिलखता है बच्चा .
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12 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-06-2014) को ""स्नेह के ये सारे शब्द" (चर्चा मंच 1631) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Anonymous said...

सपने सर्वनाम बन कर जीने लगते हैं.…" एक छाया अनुप्रास जो भीतर तक उतरता चला गया …गहरे और गहरे।
" यादें " कविता यादों की नियति को बाखूबी परिभाषित करतीं हैं। यह उन सुधि पाठकों के नासूरों पर मरहम लगाती प्रतीत होती है, जो बेचैनी में न जी पाते हैं और ना .......
"भूखे पेट", मंदिर के भगवान से आँखें मिला कर प्रश्न करती हुई उसके अस्तित्व को ही संदेह के घेरे में लेती लग रही है।
तीनों कविताओं के कलेवर का लघु होते हुए भी प्रभावोत्पादक होना, टी -२० सा सुखद लगा. बधाई
-इन्द्र सविता

सुधाकल्प said...

इन कविताओं में कवि के व्यथित हृदय का कोलाहल स्पष्ट सुनाई देता है । भावनात्मक लहरों का आलोड़न एक टीस पैदा करता है पर काव्यात्मक सौंदर्य के कारण वे सहज ही दिल में उतर जाती हैं।

PRAN SHARMA said...

TEENON HEE UTKRISHT KAVITAAYEN .
AAPKEE LEKHNI KO SALAAM .

तिलक राज कपूर said...

तीनों कवितायें अपना प्रभाव छोड़ने में सक्षम हैं।

Anonymous said...

आदरणीय आन्द्रे जी,
आपकी कविताएं पढ़ीं। "सपने" और "यादें" पढ़कर मन बहुत उदास हो गया। मै कविताएं नहीं, उनके पीछे छिपी आहत मन:स्थिति पढ़ रही थी। मन ही है न, उदास भी हो जाता है। उबरने की कोशिश भी ख़ुद ही करनी होती है। मैने भी एक कहानी लिखी थी जो "पुष्पगंधा" पत्रिका के नवम्बर- जनवरी अंक में प्रकाशित हुई थी। वह वेब पर नहीं है पर आपको अपनी ओर से भेज रही हूं। इस बाबत कुछ नहीं लिख रही। जो कहना था कहानी को ही प्रेषित करना चाहिए।
मैने यह पत्र ब्लॉग पर डालने के लिए नहीं, निजी भावों को आप तक पहुंचाने के लिए लिखा है।
सादर
अनिलप्रभा कुमार

Anonymous said...

अत्यंत सुन्दर एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति है । उत्कृष्टतम अभिव्यक्ति हेतु शतश: साधुवाद।
सुनील गज्जानी

Anonymous said...

Dhanyavad bandhu.Kavitaen dekhi.Achha laga.
Harish Chandra

Anonymous said...

आदरणीय अशोक जी,
आज आपकी तीनों कविताएँ मैंने पढ़ीं l
सपने - ' उन सपनों का क्या करें जो पीछे रह जाते हैं '
बहुत भावुक, मन को छूती हुई कविता लिखी है आपने l
यादें - जीवन के सत्य को उद्भासित करती, कहीं गहरे, कुछ सोचने को प्रेरित करती रचना l
भूखे पेट - इसमें समाज के ग़रीब बच्चों दुर्दशा का दयनीय चित्रण किया है आपने l
मुझे आपकी ये तीनों ही रचनाएँ बहुत रुचीं l
बहुत बधाई l
सराहना के साथ,
सादर,
कुसुम वीर

Anonymous said...

प्रिय भाई आंद्रे जी
लगता है सपनों में अपनों को ढूढ़ते-ढूढ़ते जिन शब्दों का आप उपयोग करते हैं उनकी सरलता को बड़े ही सीधे तरीके से हृदय की गहराइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखते हैं | कवि सीधी-सादी अभिव्यक्ति के माध्यम से कितनी गूढ़ता को स्पष्ट कर देता है यह आपकी कविताएं कह रही हैं, उसके बारे में मैं क्या कहूँ ?
पी एन टॅंडन

vandana gupta said...

behad umdaa bhaav sanyojan

Binu Bhatnagar said...

अति सुन्दर प्रस्तुति