Wednesday, September 11, 2013

अशोक आंद्रे

अंधड़ के पीछे
  
जब चला जाऊँगा देह के पार
मौत तब दरवाजों को पीटती
देह तक पहुंचने की
कोशिश करती रहेगी
क्योंकि रोश्नी की पहुँच  
मेरे साथ होगी
किन्तु अन्धेरा भी
चाँद की रोश्नी में कहीं
दरवाजों के पीछे छिपा
अट्टहास कर रहा होगा,
सन्नाटा उस पर लदा
कुछ लकीरों को
खींच देगा 
परती धरती पर,
जहां उड़ती धूल की चादरें
मौत के मुंह को ढक कर
किसी अंधड़ के पीछे धकेल देगी
क्योंकि मैं तो वहां होऊंगा नहीं
केवल देह होगी
इन्तजार करती हुई
क्योंकि लौटना तो मुझे ही है
उस देह के पास
उसका अंत भी तो वहीं है न
जहां हर बार लौटता हूँ मैं
अपनी आस्थाओं के साथ.
प्रभु तुम तो मात्र दर्शक दीर्धा के
मूक दर्शक ही तो हो
नाटक तो मुझे ही खेलना है न.
             ******   

Wednesday, August 14, 2013

अशोक आंद्रे

नारी
 
नारी ! 
 तुम तो बहती नदी की वो
जल धारा हो
जिसमें जीवन किल्लोल करता है
 
नारी,
 
तुम धरती पर लहलहाती
हरियाली हो
बरसात के साथ
जीवन को नमी का
अहसास कराती हो
 
नारी,
 
तुम गंगा सी पवित्र आस्था हो
जो समय को
अपने आँचल में बाँध
विश्वास को पल्लवित करती हो
 
नारी,
 
तुम्हारा न रहना
किसी मरघट की शान्ति हो जाती है
फिर सुहागन होने की
बात क्यूँ करती हो?
कुछ कदम साथ चलने की बात करो,
नहीं तो हताशा के भाव उभरने लगते हैं.  
 
नारी,
 
तुम तो सहचरी हो
मनुष्य के क़दमों को ताकत देती हुई
जीवन की संरचना करती हो
कुछ भी नष्ट होने की प्रक्रिया में भी
जीवन का हाथ थामने की
भरपूर कोशिश करती हो
सृष्टि का विस्तार भी तो तुम्हीं से संम्भव है
मनुष्य तो नारी को नकार
मात्र विनाश का ही आगाज करता है
 
नारी,
तुम्हारे अस्तित्व के कारण ही तो
कायनात की हर स्थितियां
तुम्हारे गीत गाती हैं
जिसे मनुष्य समझने की कोशिश नहीं करता
और  अपनी निकृष्टता का परिचय दे 
महान होने का दावा करने लगता है  
लेकिन नारी,
तुम्हारे बिना जिन्दगी की
सारी  क्रियाएं बेमानी हैं
इसीलिए नारी,
सृष्टि हर क्षण तुम्हारे 
 इसी खुबसूरत स्वरूप को,
हमेशा प्रणाम करती है.
 
          *********   

Thursday, July 25, 2013

अशोक आंद्रे

बादलों की
 
बादलों की गडगडाहट पर
 गाती हैं बुँदे
 सागर की उछाल  पर
 नाचती हैं लहरें
 वृक्षों की धडकनों पर
 लहराते पत्ते
 बजाने लगते हैं मृदंग
 धरती की छाती से निकली
 छुअन पर
 नाच उठता है जीवन
 और जमीं की छाती से
 सिर उठाने लगती है
 नन्ही कोंपलें
 फिर क्यूँ
 इतने गहन संगीत से भरी कायनात के
 ह्रदय में,
 द्रवित रहते हैं हमारे अहसास
 और क्यूँ नाचने को आतुर
 हमारे कदम
 डूबने लगते हैं
 शर्मीले भावों के नद में
 कुछ खोजते हुए.
 जबकि नाचते-नाचते मैं
 थक जाता हूँ
 पर वे  नहीं थकते कभी
 ऐसा क्यूँ ?
 ऐसे सवाल मेरे मन में  
 अक्सर गूंजते हैं
 फिर एक कोशिश----
 तभी एक पत्ता
 थाम लेता है मेरा हाथ
 अनजानी ध्वनियों की गूँज में
 तब झूम जाता है मेरा मन.
 
         ******* 

Sunday, July 7, 2013

अशोक आंद्रे

नंगे पाँव


नंगे पाँव चलते हुए निःशब्द
एक शहर पहुंचा है कस्बे के पास
जिसके साथ सब कुछ चला आया है
जिसे झुठलाना असंभव हो गया है
एक शोर है उसकी नसों में
धुंआ है अप-संस्कृति का फैलाते हुए
हुजूम है तिलिस्म आवाजों का
जिसे पोस्टर बना चस्पां करने की व्यग्रता है
उसकी हर साँसों में
क्योंकि वह नंगे पाँव खामोश चलता है।
रेंगती कतारें, उसके क़दमों के नीचे आने से पहले
हाफने लगती हैं
किन्तु-परन्तु उसकी भाषा में कोई जगह नहीं रखती है
उसके जिस्म से निकलती हर तिलिस्म आवाजें
हर जीव के अंतर्द्वंदों में दहशत के साथ
कुछ आकर्षण भी पैदा करती हैं
रेंगती चींटियो की तरह कसबे
अपने पीछे फैले जंगल को देखने लगते हैं
शहर है कि नंगे पाँव
क़स्बे की अस्मिता को उसकी ही
संस्कृति में ओंधे मूहं गिराकर
घेरने की तमाम कोशिश करता है
शहर फैल जाता है उसके चारों ओर
विजय परचम लहराते हुए
क्योंकि मीडिया उसके हथियार होते है
तभी तो कस्बे को हथियार डालने के बाद
शहर को गले लगाना पड़ता है
तब, शहर एक बार फिर किसी
नये कस्बे की खोज में
निकल पड़ता है
तब एक सवाल उभरता है उसके समक्ष
शहर का यह रूप किस मोड़ पर आकर रुकेगा
आखिर कस्बे के साथ
गाँव और जंगल को भी तो
विश्व के मानचित्र पर
अपने अस्तित्व को कायम रखने का
अधिकार तो होना ही चाहिए न,
क्योंकि शहर है कि बढता ही जा रहा है।
                                   *******

Tuesday, July 2, 2013

अशोक आंद्रे

मुक्ति


वह बूढ़ा
निहारता है रोज पृथ्वी को
उसकी नम आँखें ढूँढती हैं कुछ
पता नहीं किसको,
उसके अन्दर फैली अंधेरी गुफाओं में
जहां,पृथ्वी के अन्दर से
उठती हरियाली के बीच कुछ
जो खेतों के ऊपर लहरा जाती है।
जहां उसका वजूद
एक ताकत महसूस करता है
उसे लगता है माँ का आँचल भी तो
पृथ्वी के ऊपर लहराती हरियाली की तरह है।
कुछ कणों को उठा कर -
वह बूढा
निहारता है अपने आसपास के माहौल को
जहां तक उसकी निगाह जाती है
दूर एक सूखे टीले को देखते ही
घबरा जाता है
उसे लगता है कि
उसके चेहरे पर फैली झुरियां
उस टीले पर अंकित हो गयी हैं
डरावनी जरूर हैं पर आकर्षण भी पैदा करती हैं
आखिर उसी टीले पर तो कई बार बैठा है।
सर्द हवाओं के चलते
सवेरे की गुनगुनी धूप के कारण ही तो
उसके खेत की हरियाली भी तो आकर्षण पैदा करती है
शायद इसी के चलते                                                                                            
पृथ्वी का आकर्षण भी तो
मनुष्य को खींचता है अपनी ओर
कभी जीवन बनकर तो कभी-
मुक्ति  का द्वार बन कर।
इस रहस्य को समझते ही
उसकी आँखों की चमक
उसके चेहरे की झुर्रियों के बीच उभरने लगती है,
और वह
कुछ समय के लिए
पृथ्वी की छाती पर लेट कर
आकाश को घूरने लगता है
उसे लगता है कि
शायद उसको मुक्ति  का द्वार मिल गया है।

Sunday, June 16, 2013

अशोक आंद्रे

(तीन कवितायेँ)

 रोशनियों के मध्य

मन की ध्वनियाँ
कई बार विकृति पैदा करती हैं
और हम खोजने लगते हैं
उन तरल रोशनियों के मध्य अपनों को
जो हमारे आसपास एहसास तो देते हैं
लेकिन भयावह रूप गढ़ कर
डराते हैं हमारे समय को
जहां फिर विकराल रूप धर लेती हैं
हमारी कल्पनाएँ,
बिना सोचे-समझे उस ओर बड़ते हुए .
तब हमारी सोच को अनंतता का एहसास होता है।
लगता है शायद यहीं कहीं हमारा प्रिय
समय में गोल करते हुए
अन्धकार में छिद्र कर के
हमारे सम्मुख आ खडा हो जाएगा।
और हम उस अनंतता में हाथ हिलाते हुए
कभी अलविदा नहीं कह पायेगें।
आखिर ध्वनियाँ तो समय के ऊपर यात्राएं करती रहती हैं
उन अंधेरों में जहां एक नई खोज के लिए
ज़िंदा रह जाते हैं ब्रह्म की अविरल बहती रोशनी को
देखने के लिए हम,
क्योंकि प्रिय-
तुम्हें इसी सब के बीच तो ढूंढना है।

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जलजला
आसमान में टिमटिमाते तारों की रोशनी के मध्य
उसकी जिन्दगी की शाम में
पृथ्वी पर आया जलजला
यात्रा करता है उसके मन के भीतर फैली
पदचापों की ध्वनियों के साथ
जहां प्रकाशवर्ष को जीतने के लिए वह
आह्वान करता है
अपने अन्दर फैली दूरियों को नापने का।
और ऐसे में सोचो !
कल सूर्य ही न निकले।
लेकिन उसे हल्का सा होश हो यह सब
देखने / समझने के लिए
तब कैसा लगेगा ?
क्योंकि समय तो होगा नहीं
किसी की गति को पकड़ने के लिए।
जब जल भाप बन कर फैलने लगे
कायनात की हर स्थितियों को घेरने के लिए
और वजूद हमारा ---
हवा के बुलबुलों में तैरने लगे
क्योंकि जल तो होगा नहीं,
कैसा लगेगा उस वक्त ?
आईये देखें इसे भी एक बार
आखिर जलजला तो पृथ्वी पर आ चुका है।

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अकेला खड़ा मैं

वह मेरा शास्त्रीय दिन था उस वक्त
जब मैंने तुम्हारा साक्षात्कार करने की कोशिश की थी
तुम थी कि आँखें मूँद रही थी।
पास खड़े पेड़ के पत्ते सिहर रहे थे
जमीन पर उग आए नन्हें फूलों को उकसाने के लिए
फिर बिखर जाना उनका हवा के साथ।
उधर जमीन पर फैली हरी घास का
लहलहा उठना
एक अदृश्य बीज के पनप ने के साथ
सब कुछ इसी तरह खो जाना फिर
याद है मुझे।
आकाश में उड़ते पक्षियों को निहारते हुए -
अपनी साँसों के साथ
तुम्हारी धडकनों की आवाज भी सुन रहा था लगातार,
जो ऊपर उठती जा रही थी-
उसी जगह अकेला खड़ा हूँ मैं।
सत्य क्या है आज तक इसकी
सत्यता पर सवाल अंकित होते रहे हैं मेरे सम्मुख
क्योंकि मेरे बनाए हर सत्य
आज भी हवा में बगुले बन छितरा रहे हैं तभी तो।
हे ईश्वर !
इसीलिये मुझे उस बीज के पनप ने का रहस्य जानना है
आखिर कैसे एक दिन बिखर कर मौन हो जाते हैं वे,
न कि तुम्हारे अस्तित्व को
यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सत्य होगा
क्योंकि उस पर तो कभी मन ने कोई
सवाल उठाया ही नहीं है।

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Sunday, March 10, 2013

अशोक आंद्रे

लेकिन बिल्ली तो ....!
बिल्ली ने जब भी रास्ते को लांघा
तब हर कोई खामोश हो उसे देखता है
मन में अस्तित्व विहीन शंकाओं के गुबार
उमड़ने लगते हैं लगातार,
कितनी प्राकृतिक प्रक्रियाओं के चलते
करती हैं निरंतर यात्रा ,
उसकी तमाम इच्छाएं तथा शंकाएं बाजू में खडी रहकर।
कुछ भी तो नहीं बदलता है इस दौरान
मनुष्य है कि इसे ही शाश्वत समझ कर निगाहों से घूरता हुआ
दहलता रहता है खामोश
जिसकी निरंतरता के चलते वह,
जिन्दगी की तमाम मंजिलों को तय करता रहता है।
जबकि यह उसके दिमाग की शिराओं में
आक्टोपस की तरह अपना विस्तार कर लेती है
उसकी ही जमीन में फैली घबराहट पर,
ऐसा अक्सर बड़े-बूढ़े कहा करते हैं।
वह तो कानो के रास्ते से होते हुए
दिल को गहरा छू लेती है
जहां उसकी मंजिल तभी तय हो जाती है।
क्योंकि चेहरे तो लौटते रहेंगे इसी तरह की शंकाओं के लिए
ताकि उसकी अनंत यात्राओं के पुल बनाएं जा सकें।
ताकि उसकी प्राकृतिक सोच के साथ
जहां सब कुछ पहले से तय होता है
उसकी पूर्णता के साथ प्रस्तुत हो सके।
लेकिन बिल्ली तो फिर भी ..............!
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Monday, September 24, 2012

अशोक आंद्रे

मुद्दे
मुद्दों की बात करते-करते
वे अक्सर रोने लगते हैं.
उनका रोना उस वक्त
कुछ ज्यादा बड़ा आकार लेने लगता है
जब कटोरी में से दाल खाने के लिए
चम्मच भी नहीं हिलाई जाती उनसे,
मुद्दों की बात करते-करते
कई बार वे हंसने भी लगते हैं
क्योंकि उनकी कुर्सी के नीचे
काफी हवा भर गयी होती है
मुद्दों की बात करते-करते
वे काफी थक गए हैं फिलहाल
बरसों से लोगों को
खिला रहे हैं मुद्दे
पिला रहे हैं मुद्दे
जबकि आम आदमी उन मुद्दों को
खाते-पीते काफी कमजोर
और गुस्सैल नजर आने लगा है
मुद्दों की बात करते-करते
उनकी सारी योजनाएं भी साल-दर-साल
असफलताओं की फाईलों पर चढी
धूल चाटने लगी हैं
जबकि आम आदमी गले में बंधी
घंटी को हिलाए जा रहा है
मुद्दों की बात-करते
उन्हें इस बात की चिंता है कि
आने वाले समय में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर
आम लोगों की भूख को कैसे
काबू में रखा जा सकेगा ?
मुद्दों की बात करते-करते
वे कभी-कभी बडबडाने भी लगते हैं कि
उनके निर्यात की योजना
आयात की योजना में उलझ गयी है
रुपये की तरह हर साल अवमूल्यन की स्थिति में खडी
उनकी राजनीति लालची बच्चे की तरह लार टपका रही है
आजकल मुद्दे लगातार मंदी के दौर से गुजर रहे हैं .
############

Saturday, July 7, 2012

अशोक आंद्रे


             उम्मीद
 
जिस भूखंड से अभी
 
रथ निकला था सरपट
 
वहां पेड़ों के झुंड खड़े थे शांत,
 
नंगा कर  रहे थे उन पेड़ों को
 
हवा के बगुले
 
मई के महीने में.
 
पोखर में वहीं,
 
मछली का शिशु
 
टटोलने लगता है माँ के शरीर को.
 
माँ देखती है आकाश
 
और समय दुबक जाता है झाड़ियों के पीछे
 
तभी चील के डैनों तले छिपा
 
शाम का धुंधलका

उसकी आँखों में छोड़ जाता है कुछ अन्धेरा .
 
पीछे   खड़ा बगुला चोंच में दबोचे
 
उसके शिशु की
 
देह और आत्मा के बीच के
 
शून्य को निगल जाता है
 
और माँ फिर से
 
टटोलने लगती अपने पेट को.
             #####

        नदी 
 
 
नदी के उद्गम स्थल पर शोर नहीं होता है.
क्योंकि सारा शोर तो 
नन्हीं घास के बीच छिपा रह कर 
सृजन की पहली सीढ़ी को छूने की 
कोशिश कर रहा होता है,
नहीं तो जंगल में सृजन कैसे कर पाएगी नदी ?
 
हरियाली लिए किनारे 
जो नदी को अपनी ओर
आकर्षित करते हैं लगातार 
उसी आकर्षण की पूर्णता में ही तो,
पूरा वातायन संगीतमय हो उठता है.
                #####

Sunday, March 18, 2012

अशोक आंद्रे

दर्द


दर्द बहुत गहरा होता है -


समुद्र को नापा जा सकता है


आकाश को भी प्रकाशवर्ष से


जोड़ा जा सकता है,


लेकिन दर्द-


उसकी थाह नहीं होती है,


उसकी डूब में कोई आधार नहीं मिलता ,


इसकी गहराई विशाल होती है


ये जीवन की


जड़ों के बीच


अपना स्थाई घर बना लेती है


तभी तो मनुष्य


उसे थामने की कोशिश में


ता-उम्र


उसकी गहराई में


गोता लगाता रहता है .


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Saturday, February 11, 2012

अशोक आंद्रे







अनाम रहस्य


जिसे बिना देखे
चले जाते हैं दूर
जो कुछ भी है उनके पास
उसे, स्वयं को मौन रख कर
उसी के सहारे
अपने मौन में ही
किसी अनाम को
स्थापित करते हुए
दिखाई देते हैं.

वहां कुछ भी
समाप्त नहीं होता है.
उसकी चुप्पी
आकाश में उड़ते
पक्षी की तरह,
कोमलता का एहसास कराते हैं.
कई बार
उसके अन्दर बहता तरल
समय को छूता हुआ
आगे निकल कर
नदी का रूप ले लेता है.
लेकिन नदी -
कभी लौटती नहीं
हाँ, नन्ही चीटियाँ जरूर लौटती हैं.
एक छोटा सा घेरा बनाती हुई
ताकि मौत के रहस्य को
उदघाटित किया जा सके.
**********

जंगल में

जंगल में
छोटे से आले के अन्दर
शांत बैठी हुई मूर्ति
सिवाय आँखों के
सब कुछ कह जाती है.

अपने ही ध्यान में
खोई हुई वह,
किसी मंदिर की
मूर्ति जैसी लगती है,

बस प्रणाम करो और...
फिर कहीं दूर चले जाओ.

क्योंकि वहां खामोश
पेड़ के,
पत्तों की
सरसराहट,
किसी अज्ञात का डर,
पैदा करते हैं.

अभी तुम भी
चुप्प रहो
पता नहीं-
हो सकता है यह
इस देवी का
कोई अज्ञात रहस्य हो

तभी तो
सभी चर-अचर
नीले आकाश को देखते हैं सिर्फ ,
सिवाय... उस देवी को.
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Sunday, December 4, 2011

कविताएँ - अशोक आंद्रे


हवा के झोंकों पर

रात्री के दूसरे पहर में
स्याह आकाश की ओर देखते हुए
पेड़ों पर लटके पत्ते हवा के झोंकों पर
पता नहीं किस राग के सुरों को छेड़ते हुए
आकाश की गहराई को नापने लगते हैं
उनके करीब एक देह की चीख
गहन सन्नाटे को दो भागों में चीर देती है
और वह अपने सपने लिए टेड़े-मेड़े रास्तों पर
अपनी व्याकुलता को छिपाए
विस्फारित आँखों से घूरती है कुछ
फिर अपने चारों और फैले खालीपन में
पिरोती है कुछ शब्द
जिन्हें सुबह के सपनों में लपेटकर
घर के बाहर ,
जंगल में खड़े पेड़ पर
टांग देती है हवा, पानी और धूप के लिए
तभी ठीक पास बहते पानी की सतह पर
कोई आकृति उसके जिस्म में पैदा करती है सिहरन
तभी अपने को समेटते हुए एक ओर खड़ी होकर
ढूँढने लगती है कोई सहारा
मानो इस तरह वह अपनी देह के साथ
अपनी कोख को आहत होने से बचाने के लिए
अपने ही पैरों से कुछ रेखाओं को खींच कर
किसी अज्ञात का सहारा ले रही हो
तभी घबराहट में उसके बाल हवा में लहरा जाते हैं
जिन्हें बांधने का असफल प्रयास किया था उसने
जिन्हें बिखरा,उसके चेहरे को
ढक दिया था किसीअन्य देह ने
ताकि उसकी कोख को
जमीन छूने से पहले झटक सके अपने तईं.
उधर पानी की शांत लहरें
उसके बुझे चेहरे पर सवालों की झरी लगा देती हैं
जो फफोलों में बदल कर लगते हैं भभकने.
अनुत्तरित जंगल खामोश दर्शक की तरह
अपनी ही सांसों में धसक जाता है
तभी मूक हंसी लिए ओझल हो जाती है वह देह कहीं दूर
छोड़ जाता है उसे उसके ही अकेलेपन के
घने कोहरे के मध्य
शायद यही हो सृष्टी के अनगढ़ स्वरूप की कर्म स्थली
नया आकार देने के लिए उसको
शायद इसीलिए जंगल ने भी
हवा के झोंकों में खो जाना ज्यादा सही समझा
शायद इसीलिए वह फिर नये सिरे से
जमीन को कुरेदने लगी है
अपने ही पाँव के अंगूठे से


###############

दो

पानी का प्रवाह

जो
पूर्ण है-
उसे व्यक्त करना
अथवा उसकी ओट से
विध्वंस की भावनात्मक सोच का
विस्तार करना
किस दिशा की ओर इंगित करता
कहीं यह सत्य का विखंडन करना तो नहीं?
उसके प्रवाह को रोकना सत्य हो सकता है क्या ?
सत्य तो परावर है
जिस तरह पहाड़ों से नीचे की ओर
आता पानी
भविष्य को निर्धारित कर जाता है
जैसे ठीक बरसात के बाद
सूखी जमीन पर फैली घास को छू कर
पानी का प्रवाह
विस्तार कर जाता है ईश्वरीय सत्ता का.

********

Sunday, August 28, 2011

अशोक आंद्रे

साकार करने के लिए

कविताएँ रास्ता ढूंढती हैं
पगडंडियों पर चलते हुए
तब पीछा करती हैं दो आँखें
उसकी देह पर कुछ निशान टटोलने के लिए.
एक गंध की पहचान बनाते हुए जाना कि
गांधारी बनना कितना असंभव होता है
यह तभी संभव हो पाता है
जब सौ पुत्रों की बलि देने के लिए
अपने आँचल को अपने ही पैरों से
रौंद सकने की ताकत को
अपनी छाती में दबा सके,

आँखें तो लगातार पीछा करती रहतीं हैं
अंधी आस्थाओं के अंबार भी तो पीछा कर रहे हैं
उसकी काली पट्टी के पीछे

रास्ता ढूंढती कविताओं को
उनके क़दमों की आहट भी तो सुनाई नहीं देती
मात्र वृक्षों के बीच से उठती
सरसराहट के मध्य आगत की ध्वनियों की टंकार
सूखे पत्तों के साथ खो जाती हैं अहर्निश
किसी अभूझ पहेली की तरह
और गांधारी ठगी-सी हिमालय की चोटी को

पट्टी के पीछे से निहारने की कोशिश करती है .

कविताएँ फिर भी रास्ता ढूंढती रहती हैं
साकार करने के लिए
उन सपनों को-
जिसे गांधारी पट्टी के पीछे
रूंधे गले में दबाए चलती रहती है.
*********

Monday, June 13, 2011

अशोक आंद्रे

बाबा तथा जंगल

परीकथाओं सा होता है जंगल
नारियल की तरह ठोस लेकिन अन्दर से मुलायम
तभी तो तपस्वी मौन व्रत लिए
उसके आगोश में निरंतर चिंतन मुद्रा में लीन रहते हैं
बाबा ऐसा कहा करते थे.
इधर पता नहीं वे, आकाश की किस गहराई को छूते रहते
और पैरों के नीचे दबे -
किस अज्ञात को देख कर मंद-मंद मुस्काते रहते थे
उन्ही पैरों के पास पडीं सूखी लकड़ियों को
अपने हाथों में लेकर सहलाते रहते थे.
मानो उनके करीब थकी हुई आत्माएं
उनकी आँखों में झांकती हुई कुछ
जंगली रहस्यों को सहलाती हुई निकल रही हैं.
फिर भी वे टटोलते रहते थे जीवन के रहस्य
उन्ही रहस्यों के बीच जहां उनके संघर्ष
समय के कंधे पर बैठ
निहारते थे कुछ अज्ञात.
उनके करीब पहाड़ फिर भी खामोश जंगल के मध्य
अनंत घूरता रहता था.
यह भी सच है कि जंगली कथाओं की परिकल्पनाओं से बेखबर
मंचित हो सकने वाले उनके जीवन के अध्याय

अपनी खामोशी तोड़ते रहते,
ताकि उनका बचपन-
उनके अन्दर उछल कूद करता
जंगल को उद्वेलित कर सके
ताकि वे अपने संघर्ष को नये रूप में परिवर्तित होते देख सकें --सिवाय अंत के .

*********

Saturday, January 2, 2010

विजयकिशोर मानव की चार कविताएँ


किराये के घर
अलग - अलग घरों में
माँ ने जना हम सबको
मझोले शहर के एक दो मुहल्ले
और चार - पाँच घरों में

टूट गए घर किराये के
लेकिन हर झूटे हुए घर की डोर
नए से बाँध लेते रहे माँ - पिता
बधे रहे करीब - करीब आखिर तक
टूटे हुए लोग बने रहे हमारी पूरी उम्र
सगे रिश्तेदारों की श्रेणी में
माँ ने सहेजीं सहेलियाँ और
हम सब नहीं रहे मुहताज दोस्तों के

किराये के घरों में बिखरे
संस्कार ढेरों छोटे - बड़े
सौर से, कनटेदन , पट्टी पुजने
जनेऊ , गोद भरने और व्याह -- बधावे तक के
थापें माँ की दी पराई चौखट पर
पुताई की कई पर्तों के नीचे से
झाँकती - मुस्कराती हैं
जब कभी गुजर पड़ता हूँ उधर से

मैं आज पर आता हूँ
जन्मदिन होता है बेटी का , बेटे का
हर बार नए घर में
नहीं लिखा जाता व्यवहार कापी में
लेने का देने की ही तरह
नहीं होती पूरे खाने की दावत
नाचते हैं बच्चे किसी कैसेट के साथ
एक प्लेट में सजी होती है खानापूरी
घर के आसपास नहीं होते दोस्त
स्कूल जैसे पक्के - पुराने

पानी भरे जार की जलकुंभी
जड़ें सिर्फ तैरती हुई
पानी बदल जाता बार - बार
यादें ,संबंध ,दोस्त - यार और संस्कार
मेरे पास कुछ नहीं ठहरा उस तरह
जैसा किराये के घरों में भी
माँ -- पिता के पास से
पाया था हम सबने ...


सौ बरस
वह नहीं रहे
सौ के थे पूरे
वर्षों से हर साल छपती थीं ख़बरें
इनके इतना जीने की
असल में ख़बरों में ज़िंदा थे वह
वर्षों से चारपाई पर पड़े
कुछ न करते
चलती सांस के गुनहगार
बड़े ओहदे पर से उतरे
हो गए बीसियों - तीसियों बरस
किसी के लिए कुछ किये
देर से दिखते अटक - अटककर बोलते
बन गए उनके नाम के मुहल्ले
सड़कें गलियां कई उनके रहते
कपडे उतारता- पहनाता कोई
घर के लोगों को फुरसत होने तक
मैली - कुचैली पडी रहती काया
भूख भी लगती सबकी फुरसत देखकर
शुरू की उम्र चौथाई ऊंगली पकड़कर जीते
पाते आषीड्ढ हुलसकर दिए बुजुर्गो के
गदुद हो जाते थे हम भी
चौथाई उम्र बाद की काटते
पकड़े उंगली सबकी सांस लेते
ताने सहकर निरुत्तर जीते कातर
देखते सामने की आँखों में
अपनी मौत की उम्मीद
बैसाखियों पर टिकी उनकी उम्र
एक इतिहास कौंध जाता है मेरे भीतर
जब दादरी दे डालती है सौ बरस
उन्हें देखकर खिलखिला उठे दुधमुहें को


सच्चाइयाँ
मेरी अपनी अलमारी में
ऊपर के खाने में
पीके कोने में रखा
कागज का पुराना अधफटा टुकडा
किसी और की लिखावट का
किताबों के बीच
न दिखे , इस जतन से रखी डायरी और उसमें
पंखुरी -पंखुरी हो गया फूल
पिता का लिया क़र्ज़
चुकाने का बाद
हासिल हुए - इंतुल तलब रुक्के
क्यों डराते हैं मुझे ?
पत्नी और बच्चे के
अलमारी टूने पर
क्यों खीझने लगता हूँ मैं ?
मुझे पता ही नहीं चला
कब डर बन गयी
मेरी निजी सच्चाइयाँ !


शोक की श्रेणी

तुम्हें कोई याद नहीं आता
बड़े -बड़े पंख
ऊंची परवाज वाले कटते देखते
कमरे के घोंसले में
बच्चों को दाना चुगाकर जाती
गौरेया का पंखें से टकराकर
लहूलुहान होना
नहीं आता तुम्हारे शोक की श्रेणी में
नहीं फटा होता है
इज्जत लुटने की खबर लेकर आता
अखबार का कोना
कुछ नहीं होता भीतर तुम्हारे
पैरों तले कुचल जाने पर
गुलाब का छतनार फूल
फिर क्यों आना चाहिए
एक बड़े शोक की श्रेणी में,
कुछ भी न देख पाने वाली
तुम्हारी आँखों की रोशनी का जाना
डूब जाना संवेदनहीन
दिल की धड़कनों का अचानक
राष्ट्रीय शोक की श्रेणी में -
आनी चाहिए क्यों ? किसी एक अकेली मौत को
जो सचिवालय की ऊपरी मंजिल से
देख पाता था
सिर्फ हरियाली राजधानी की

*************

प्रकाशित कृतिया - राजा को सब क्षमा हैं (पहला ऋतुराज सम्मान ) , गाती आग के साथ (कृति सम्मान ,हिंदी अकादेमी ,दिल्ली ), आँखें खोलो ,नवगीत दशक - तीन के कवि , आंधी की यात्रा।
पिछले ३४ वर्षो से पत्रकारिता से सम्बंधित कई अखबारों से जुड़े रहे।
वर्तमान में हिन्दुस्तान टाइम्स की प्रमुख पत्रिका कादम्बिनी में कार्यकारी संपादक के पद पर आसीन ।
संपर्क -उत्सव ,सेक्टर २ सी - २०७ वसुंधरा , गा़जि़याबाद
0120-4101439
0120-2880378
9810743193

Tuesday, October 20, 2009

तीन कविताएँ - बसंत कुमार परिहार

आदमी बहुत छोटा है

आओं,
इन हवाओं के साथ मिलकर गाएं
इनकी सरसराहट में
प्रादेशिकता की बू नहीं -
न मजहबी तास्सुबे, न कटुता -

आओं,
इन विहगों के साथ मिलकर गाएं
और उडें निर्भीक होकर -
इनकी दुनिया में
न दहशतगर्दी है,न आतंक -
इन्हें न सैलाब का डर है
न किसी आंधी या तूफान का-
इनकी दुनिया में आंतकवादी नहीं होते,
हवाओं की तरह
इनका जीवन भी मुक्त है बन्धनहीन.
अपनी इच्छा से उड़ते हैं ये प्रवासी -
इनकी दुनिया में कोई रोकटोक नहीं
न कोई बंधन है पासपोर्ट का
न प्रवास - पत्र की जरूरत-

हवाओं की तरह
गुदगुदा लेते हैं ये सीना
चढ़ी नदी का-
घुस जाते हैं पर्वतों की फटी दरारों में-

पेड़ों से कर लेते हैं छेड़खानी -
अपने पंखों पर
तोल लेते हैं ताकत तूफानों की.
आदमी कितना छोटा है इनके आगे!
खुद अपने आप से डरा
अपने बन्धनों में बंधा
अपनी ही रस्सियों में कसा-

आओं, हवाओं के साथ गाएं
पक्षिओं के साथ उड़ें !

परिंदा

मैंने जब- जब
पानी की सतह पर
चलने की कोशिश की
मुझे उस आसमान से डर लगा
जो सागर में छिपा
थरथर काँप रहा था
और हैबत खाई नजरों से
मुझे घूर रहा था

सागर में दुबका बैठा वह भीरु
अगर
तनकर खडा हो गया होता
जुल्म के खिलाफ उठी
किसी तलवार की तरह
तो सच कहता हूँ
मेरे भीतर जो बैठा है अदम्य
पानी की सतह पर चल पड़ता पुरजोर !

यह अन्दर का ही भय है
जो मारता है मनुष्य को
वर्ना
पानी चाहे कितना ही सुनामी बनकर
क्यों न गरजे या लरजे
कहीं वह
संस्कृतियों और मनुष्यों को मिटा सकता है !

मैं जानता हूँ
कि मैं चल सकता हूँ
सतह के ऊपर
लेकिन
पहले मुझे
उस हिलते हुए आकाश को
बाँध लेना है अपनी बाहों में
जैसे वह छोटा सा परिंदा
बाँध लेता है आकाश को
अपने पंखों की परवाजी कुव्वत में
और अपनी छोटी सी आँख में
बिठाकर उसे
घूमता रहता है उन्मुक्त -
गुदगुदा लेता है
नदिओं , सरोवरों और सागरों का सीना
और उठा ले जाता है
पानी की बूँद में बैठा नायाब मोती !

परिंदे की दुनिया में
डर का नाम लेना वर्जित है
इसीलिये शायद
हवाई जहाज ईजाद करने वाले इंसान से भी
कहीं ज्यादा लम्बी
उड़ान भर लेता है परिंदा !


जमीन से पहचान

आसमान की ओर ताकने से
तकदीरें तो बुलंद नहीं हो जातीं -
पता नहीं शायद इसी गलतफहमी में
इस देश के लोग
आज तक
ताकते रहे हैं आकाश
और भूतली साजिशों से
नितांत बेखबर रहे !

ऋतुचक्र तो घूमना था- घूमता रहा
बसंत आया - अनदेखा कर दिया
शरद मुस्काई - हेमंत सिसियाई
थरथर कांपते काट दीं शिशिर की रातें
निदाध के दाग भी सहे सीने पर-
तुम्हारी दुर्दशा देख
क्वार भी भाग गया फटा गूदड़ समेत!

नजर झुकाकर
जरा देखते तो सही अपनी जमीन
मूसलाधार वर्षा ने
कैसा दलदल कर दिया है सबकुछ
तुम्हारे पांवों तले-
लेकिन अब खुलने लगा है आकाश
और मौसम भी होने लगा है साफ जरा-जरा
पर तुम
दलदल में धंसे रहना
अपनी नियति समझ बैठे हैं -
कम्बल में गुच्छू -मुच्छू बैठे
आकाश ताकते रहने से
तुम आकाश के तारे तो नहीं तोड़ सकते ?

उठो !
निकलो दलदल से बाहर
और तुम्हारे इर्द-गिर्द
जो सब्जा उग निकला है
उसकी तरावट महसूस करो !
अब तक कुल पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित तथा कई पुरुस्कारों से सम्मानित।
वर्तमान में -त्रैमासिक -पत्र 'आकार ', अब अहमदाबाद आकार का लगातार सम्पादन ।
संपर्क -१/१, पत्रकार कालोनी , नारायणपुरा , अहमदाबाद (गुजरात )
फ़ोन : ०७९-२७४३५८०१

Monday, October 19, 2009

आस्था अनंतिम (कहानी) - राज कुमार गौतम

आस्था का यूं जबरन बुलाना .......अनंतिम को पहेली - जैसा लग रहा था . अभी दो महीने ही तो गुजरे हैं मुलाक़ात हुए . मुलाक़ात नहीं , 'मुठभेड़ ' हुए -अनंतिम ने सोचा और शरारती मुस्कराहट का मजमा उसके चेहरे पर नमूदार हुआ . फ्लाईट का सहयात्री भी मानो इस मजमे का मज़ा ले रहा था. आस्था तो इस 'मुलाक़ात' से मानो सहम ही गयी थी . "इतना आक्रामक होने की क्या जरूरत थी ?" अनंतिम से सवाल पूछते हुए आस्था भी कम आक्रामक नहीं थी !

"क्योंकि मैं अपने ज्ञान और व्यायाम के सर्वोच्च शिखर पर था. इसलिए . आज की समझदार और मेच्योर दुनिया में सफल होने के लिए आक्रामकता और दुस्साहस की जरुरत है . दैट्स इट!"

आस्था ने स्वयं को तेजी से समझाया और चुपा गई. 'कुछ होने तक इन्तजार करो '-का सूत्र उसे याद आ रहा था आस्था की निःशब्दता से अनंतिम को फिर गलती लगी थी उसे समझने में . अनंतिम जो कि जीवन को एक तंत्र , पद्धती की तरह सोचता है और आस्था जो कि जीवन को एक महान संस्था के रूप में पाती है . नदी की तरह बहता आता है जीवन और पता नहीं हिम कण का कौन - सा कतरा हमें पानी की तहों में एकाकार कर देता है . प्रकृति के इस करिश्मे में नेतृत्व किसी अदृश्य का है - ऐसा मानती है आस्था , जबकि अनंतिम की 'लीडर ' और 'ग्रेट ' होने में रूचि है . दिन को जीना छतीस घंटे के बराबर - यह जीवन- दर्शन है . उपलब्ध चादर से बाहर सोचना और सोना - यह प्रयास है और ज्ञान के बलबूते पर भविष्य को सामने से झेलना - यह शूरवीरता है अनंतिम की . जीवन की सायं-सायं करती नीरवता के नहीं , शंखनाद के बीच जीना पसंद आता है अनंतिम को
"मगर इससे तुम्हें विजय के उल्लास भाव से वंचित होना पड़ता है ." आस्था ने टिपण्णी की थी एक बार.
"आस्था, तुम्हें नहीं लगता कि जीवन की भी मार्केटिंग होनी चाहिए. इस बाजार को बढना और फैलना चाहिए. हमारी- तुम्हारी एकल दुनिया की एक पर्सनल लैंग्वेज होनी चाहिए. उत्पादन और आधुनिक तकनीक का संतुलन स्थापिक होना चाहिए." अनंतिम का पेशेवर व्यक्तित्व बोल रहा था, मगर उसका व्यक्ति कहीं हिचकोले ले रहा था. आस्था ने उन हिचकोलों की सवारी गांठी. "सच बताना अनंतिम, तुम्हारे जीवन- आदर्शों के चलते तुम्हें साथी के रूप में एक प्रियतम चाहिए थी या बाजार की परिस्थितियों को बेहतर पहचानती एक ऐसी औरत जो कि अपने मादरजात आकर्षणों को बेचकर तुम्हारे भविष्य को अगले सौ वर्षों तक सुरक्षित कर पाती?"
वाक्पटु अनंतिम का उत्तर एकदम किताबी था, "उस औरत के भीतर से मैं अपनी प्रियतम को आरक्षित कर लेता और उसके शेषांश को बाजार में चढ़ा देता. इस रणनीति के साथ कोई राजनीति नहीं, कोई मर्दवाद भी नहीं. फिर भी कहता हूँ कि घिसे- पिटे आदर्श, जैसे संबंधो की पवित्रता वगैरह-उतने गए - गुजरे भी नहीं थे. जीवन की नई चुनौतियों को मैं खारिज नहीं करूंगा, बल्कि उन्हें टालना या सहना चाहूंगा. समस्याओं के निदान में तेजी से विकास आना चाहिए, नव और भव्य क्रिएटिविटी के साथ."
"ठीक ऐसा ही तुमने मेरे साथ किया. पहले प्रेम करने का जोखिम उठाया, फिर सम्मान प्रदान करने के तौर पर शादी रची!" आस्था के इस सवाल या जवाब से अनंतिम परेशान नहीं हुआ. समझाने का स्वर था उसका, "तुम मानव इतिहास देखो आस्था , क्या है उसमें सिवाय मूल्य, सौंदर्य, व्यक्ति और समाज की जान-माल की सुरक्षा, बेहतरी और श्रेष्ठता के लिए ख़ास आकर्षणों आदि के. इन सबको हमें प्राथमिक स्तर पर देखना होता है. यह बदलता जीवन है ....बारहमासी वसंत आने को है. इस पर विलाप करने की कोई गुंजाइश कहाँ!"
संवाद के इस अंश को ही आस्था ने उस 'मुलाक़ात' से जोड़ लिया था. शादी के वर्षों बाद उन दोनों ने फैसला किया कि इस अकेली और इकहरी गृहस्थी में अब संतान को भी आमंत्रित किया जाए. सफलता के लिए एक बार फिर से ज्ञान को सीढ़ी बनाया था अनंतिम ने. देश के दूरस्थ शहरों में अलग-अलग शानदार नौकरी करने की विवशता झेलते हुए भी आस्था अनंतिम ने एक- दुसरे में समर्पित-निसर्जित होने का संकल्प लिया था. दोनों के लिए ही अवकाश लेना एक समस्या थी और फिर उन ख़ास तिथिओं में अवकाश लेना, जबकि ऋतुमती होने के बाद आस्था संतानोत्पत्ति की शर्तिया खान बनी हुई हो.
बमुश्किल चार दिन - रात का इंतजाम हो पाया उस लहलहाती अवधि में . आस्था, अनंतिम के लिए फ्लाइट की बुकिंग हो गयी और किसी तीसरे शहर में उन दोनों के लिए पांच सितारा होटल का कमरा भी. हलाँकि अब तक वे एक-दूसरे के लिए खुली किताब बन चुके थे, मगर इस बार उनके पास एक चाबी भी थी, जिनके जरिये वे एक शिशु के लिए आगमन द्वार खोलने को उद्धत थे.
सब कुछ नाप-तौल कर हो रहा था, मगर ऐन वक्त पर प्रकृति अपनी चाल चलने से बाज नहीं आई. उन तीन दिन-रातों तक आस्था की देह से अनंतिम के लिए गाली बहती-रिसती रही और इस चक्र विलंब का स्पष्टीकरण उन दोनों के पास नहीं था. खीझ और औने-पौने शरारत पूर्ण कृत्यों से पांच सितारा होटल का वह कमरा भी किच-किच होता था.
अंतिम दिन होने के उदासीपूर्ण एहसास को अनंतिम ने तोडा, होटल का कमरा बदल कर. अनंतिम ने फिर तय किया कि प्रकृति से पराजित नहीं होना है उसे. सीप में मोती की स्थापना के लिए जरूरी है कि अपने ज्ञान के विशवास को रत्नजडित बनाया जाए .
"आस्था, मैं चाहता हूँ कि हम केवल एक बार मिलें. मुझे पूरा यकीन है कि यह श्योर शाट होगा. और यदि हम असफल रहे, तो फिर जल्दी ही छुट्टियों का जुगाड़ कर लेंगे."
अनंतिम की इस शरारत को आस्था ने अपनी आँखों में गहरे छिपा लिया था.
आस्था के लिए वह रात ब्रहम्मांड के दिखते-छिपते हजारों चाँद लेकर आई. बिस्तर पर फूलों लदी घाटी उग आई थी और खुशबू के तमाम समन्दरों ने अपनी लहरों में उसे सराबोर कर दिया था. उसका शरीर एक महाकाय वाद्य यंत्र था जो जरा - सा झंकृत होता, तो तमाम अजन्मे शिशुओं की समवेत किलकारियां उसके कानों में धक्का-मुक्की करतीं .
"आस्था !" अनंतिम ने पुकारा था उसे और परीलोक से बाहर आते ही वह कांप उठी . अनंतिम दवाओं के कुछ काले नीले रैपरों को पुचकार रहा था और अगले ही पल उसने स्वयं को मानो इस मारामारी कि सहभागी नहीं, प्रतिभागी बना लिया था .
अब आस्था हिस्त्र पशुओं के बाड़े में घिरी थी , उनकी भूख -प्यास, नफ़रत, हिंसा , नुकीले सींगों,कटखने दांतों और बघनखों को झेलती . अनंतिम एक उत्तम तैराक कि तरह डुबकी लगा रहा था और उसकी नसों में दवाओं का दैत्य हरहरा कर बह रहा था . पांच सितारा होटल के उस कमरे में आस्था का आसमान गायब था और पाताल में डूबते हुए उसका दम घुट रहा था. अन्तरंग संबंधों के शव को नोचने सियार, गिद्ध कौवे .... सब इकट्ठा हो रहे थे . हजारों चूहों कि कुतरन...... लाखों आक्टोपसों कि भुजाओं कि लिजलिजी जकड़न ......!
प्रलय के कुछ पलों के बाद आस्था ने अपनी बगल में एक बेस्ट परफार्मर को मुहं फाड़ कर सोते हुए पाया. रात भर स्लो मोशन में नरक का दृश्याव्ला आस्था की देह में रस्सी बन कर तनी रही.
"मैं तुम्हारे प्रेम भरे दिल से तिरोहित होना चाहती थी, अनंतिम."
ऐसा सोचते ही आस्था को रोना आ गया.
फाइव स्टार होटल का वह कमरा किसी और के नाम बुक हो गया. फ्लाइट्स ने उन दोनों को अपने-अपने शहर के फडफडाते सीने में उतार दिया. नलों में पानी आता रहा. समर्थकों के लिए बाबा लोगों के प्रवचन जारी रहे. घडियां टिकटिकाती रहीं. कैलेंडर से दिन मुहं छिपाते रहे और इस सारी चलायमान स्थिति में आस्था ने देखा और फिर डॉक्टर ने पक्का किया कि हाँ, वह रूक गई है!
उधर अनंतिम भी व्यकुल था. 'फोक्स' गोल या श्योर शाट के परिणाम को जानने के लिए. महीना बीत जाने पर पल-पल की पूरी जानकारी. उसने जिन्दगी का सर्वाधिक पेचीदा दावं लगाया था. आस्था भी एक-दो दिन ही छिपा सकी इस सच्चाई को. 'डील' के सफल होने की सूचना से अनंतिम तो एकदम तर-ब-तर. एक पल में छत्तीस हजार बार पीठ ठोंक डाली अपनी.
सप्ताह भी नहीं बीता कि अनंतिम के लिए वह सफलता विगत हो गयी. फोन पर वह इस बात की चर्चा भी नहीं करता, जबकि आस्था के दिन-रात महाभारत हो चले थे. आस्था ने जब
इसे मुद्दे की तरह बनाना तो अनंतिम ने फैसला दिया,"कीप इट सिंपल. लो प्रोफाईल्ड ."
मगर आस्था को चैन कहां! कैसी उद्दाम हिंसा और वासना के स्वाद ने उसकी कोख को
छुआ है. इस घृणा और अनचाहे ममत्व को आजन्म कैसे बर्दाश्त किया जा सकेगा ? उसने स्वयं को यह समझाने की कोशिश की कि पीड़ियों के अन्तराल में चीजें नहीं रहतीं, मगर
शिशु को प्रेम से दुनिया में न लाओ, इससे तो पूरी मानवता को ख़तरा है. हाँ इतना वह मानती
है कि नर-मादा की गर्भाधान के वक्त की मानसक स्थिति का आंशिक अवतरण आने वाले जीव में होता ही है.
भ्रूण हत्या ...! आस्था पूरी बात सोचने से पहले ही सिहर उठी. उस जीव का भला क्या दोष जो कि एक परिणाम या उत्पाद के रूप में सामने आने को है. हाँ, दोष तो उस बाजारू
प्रबंधन का है जिसने जाने-अनजाने शिशु के आगमन को अपंगता दे डाली है. और माध्यम
बना है-अनंतिम.
आस्था की गंभीरता और दृडता देख कर ही अनंतिम छुट्टियों का जुगाड़ करके पहली फ्लाईट से आ रहा है. आमने-सामने हो कर ही आस्था जानना चाहेगी कि क्या कहा जाए?
लंबा- सा विवाद है. संवाद दोनों के माध्यम से गायब. शिशु हन्ता बनें - यह बात भी दोनों को मंजूर नहीं. तो फिर प्रायश्चित और पश्चाताप ही बचता है. ...और अंत में आस्था, अनंतिम एक बिन्दु पर पहुंचे हैं कि आने वाले शिशु के लिए यह घटना एक लिखित दस्तावेज बने और
सही समय आने पर वह इस कुरूप सचाई को जान सके .
वाक्पटु अनंतिम का मस्तिष्क फिर भी कुछ सुझाने से बाज नहीं आता, "आने वाली दुनिया में प्रेम और एकता ही सबसे बड़ी और उपयोगी तकनीक होगी. आदर, टीम वर्क,आमोद - प्रमोद ,परस्पर विश्वास ,श्रेष्टता तथा सर्जना ...अंततः इन्ही से जिंदगी संवरेगी . मैं नहीं मानता कि दोषारोपण के आत्म स्वीकार से मैं अच्छा सिद्ध होऊंगा या ओछा ...मगर हां,गलती मुझसे हुई है ...शायद !"
और हां ,आस्था ने यह कहानी स्वयं लिखी है अपने अजन्मे शिशु
के लिए .



कई पुस्तकें अब तक प्रकाशित तथा हिन्दी अकादमी, दिल्ली और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान , लखनऊ द्बारा सम्मानित।
६०/४ सी सेक्टर -२ डी आई जेड एरिया , काली बाड़ी मार्ग , न्यू दिल्ली -११०००१
०९९३३२६५१९९ , ९३१३६३६१९५

Monday, September 21, 2009

अशोक आन्द्रे

बुढ़िया , किला और नारियल


गोले दागते नारियल के पेड़ झर रहे हैं ।
खामोश जातियों के खामोश किले
जंग लगे दरवाजों के पार
कुत्तों की भौंकती आवाज पर चौंक उठते हैं ।
कहीं कोई दृश्य उभरता नहीं है ,
रेतीले रास्ते ,
इधर -उधर फैल गये हैं ।
किले के दरवाजे
टूटी खिड़किओं से झांकते हैं कुछ ?
लेकिन नारियल के पेड़ झर रहे हैं ।

अचानक एक बूढी़ आत्मा
अपने को मैली - कुचैली धोती में छुपाए
लोहे के दरवाजे से देखती है कुछ ,
मानो शांत खडी
खोज रही है किसी को
न पाकर उदास हो जाती है
किले का दरवाजा बंद है
हवा में दहशत है,
क्योंकि नारियल के पेड़ झर रहे हैं ।

कुछ भी सामान्य नहीं है किले में
कुर्सी - मेजें तीन टांगों पर खड़ी
घूरती हैं मुख्य रास्ते को
जहां कभी कारवां गुजरता था
हाथिओं , घोडों तथा सैनिकों का दल ,
महल के मुख्य दरवाजे की ओर
बुढ़िया अभी भी ताक़ रही है खामोश
क्योंकि नारियल के पेड़ कुछ नहीं कहते,
सिर्फ झर रहे हैं लगातार ।

महल के दालान में
हाथी पर सवार दो मूर्तियां अभी भी
उसी दम -ख़म के साथ पहरा दे रही हैं ,
कोई पार नहीं कर सकता दालान को
मानो ! आज्ञा का इन्तजार अभी भी हो रहा है
मानो दोनों मूर्तियां रोक देंगी रास्ता हर आने वाले का
बुढिया अन्दर नहीं जा रही है
प्रवेश द्वार से घूरती है लगातार
एक द्वंद्व चल रहा है -
उस बुढ़िया तथा महल के बीच
पौधे , वृक्ष के नीचे कतार बांधे
लील रहे हैं शाम की डूबती धूप को
रात , लोहे के गेट से अन्दर आना चाहती है
महल के नीचे तहखानों में छिपी आत्मायें
करने लगी हैं हलचल
उनके इस शोर से सभी डरते हैं,
अगर नहीं डरता कोई तो वे नारियल के पेड़
जो झर रहे हैं आज तक ।

खामोश जातियों के खामोश किले
दम तोड़ने की कोशिश में
आंखों पर पट्टी बाँध चुके हैं ।
लेकिन बुढ़िया अभी भी झांक रही है
महल खामोश है सदियां चुप हैं
इतिहास भी खिसक गया है कहीं ,
दोनों मूर्तियाँ अभी भी पूरे किले की
मातम पुर्सी के लिए
महल के नीचे तहखानों में छिपी
आत्माओं को
न्योता दे रही हैं ।
तभी दबे पाँव बुढिया प्रवेश करती है .......
ठीक दालान के मध्य ,
झरता नारियल का पेड़ दाग देता है एक गोला ,
फैल जाते हैं इतिहास के पन्ने चारों ओर ,
कई चेहरे किसी एक चेहरे को उठाए
महल की सीढ़ियाँ चढ़ने लगते हैं
मूर्तियां भी देती हैं रास्ता उनको
बुढ़िया तहखाने में छिपी आत्माओं के साथ
अदृश्य हो जाती है ,
नारियल फिर भी दागता रहता है गोला ,
क्योंकि बुढ़िया उन आत्माओं के साथ फिर - फिर
लौटेगी ,
क्योंकि उसके तथा महल के बीच चल रहा है द्वंद्व सदियों से ,
क्योंकि मूर्तियां तो हटेंगी नहीं
और रास्ते फैलते रहेंगे इसी तरह
हाँ , नारियल भी जरुर , दागता रहेगा गोला
ठीक , इसी तरह ।

Sunday, June 14, 2009

कविता - अशोक आंद्रे

पता नहीं मैं कहाँ आ गया हूँ ?
क्यों कि आना अपने हाथ में नहीं होता है ।
लोग कहते हैं कि आना ही पड़े तो ,
बिना आवाज किए आना चाहिए
जैसे हवा नासा में घुस जाती है
जैसे दहशत पूरे शरीर में समा जाती है
जैसे पानी में जीव आ जाता है
जैसे रात होते ही सपने किसी तूलिका में घुस आते हैं
और माँ के आनंद में जैसे विश्वास घुस जाता है
तब पता चलता है कि हम कहाँ आ गए हैं ।

Monday, March 9, 2009

संस्मरण -अशोक आन्द्रे

जब मौत से मेरा साक्षात्कार हुआ

जीवन में अक्सर कई ऐसी घटनायें घट जाती हैं जो लंबे समय तक मस्तिष्क पटल पर ज्यों - की- त्यों अंकित हो जाती हैं । ठीक इसी प्रकार की एक घटना अगस्त ,७६ के आसपास मथुरा में घटी थी , जिसे याद करके आज भी सिहर उठता हूँ ।
उन दिनों मैं पी सी एस की तैयारी कर रहा था । घर में शोर- गुल से तंग आ कर मैं एक दिन किताब ले कर यमुना के किनारे चला गया । वहां पहुंच कर मैं २५ पैसे में नाव द्वारा यमुना पार कर के दूसरे किनारे चला गया । वहां एक भग्नावशेष था जो हर साल बाढ़ के दिनों मैं डूब जाया करता था । इसलिए उसकी दीवारों पर शैवाल की - सी चिकनाहट उभर आई थी । लेकिन एकांत होने के कारण पढ़ाई के लिए सर्वथा उचित स्थान था ।
उस दिन जब मैं उस टीले पर बैठ कर पढ़ाई में व्यस्त था , तो पता नहीं कब और कहां से एक सांप का जोड़ा वहां आ कर मस्ती में झूमने लगा था । कुछ पल बीतने के बाद मेरा ध्यान उनके फूफकारने से टूट गया । मैंने देखा उनमेँ से एक अपना सर उठाए इधर - उधर लहराता हुआ क्रोध मैं फुफकार रहा था । देख कर मैंअन्दर तक सिहर गया । लगा , आज वास्तव में मैं अपनी मौत से साक्षात्कार कर रहा हूँ । घबराहट में , मैं खडा हो गया । सांप बार - बार मेरी तरफ बढ़ने की कोशिश कर रहा था । लेकिन चिकनाहट होने के कारण उसकी चेष्टाएँ लगातार असफल हो रहीं थीं । जिसके कारण उसका क्रोध अपनी चरण सीमा पर जा चुका था ।
शायद मुझे अभी जिंदगी में बहुत कुछ करना है । ये शब्द मुझे बार - बार घबराहट से उबार रहे थे । इसी बीच भाग्यवश एक नाव उधर से होकर गुजरी । उस पर बैठे मल्लाह ने शायद उस दृश्य को देख लिया था । वह पास आ कर जोर - जोर से पुकारता हुआ कह रहा था ,-भैया , तुरन्त टीले के दाईं ओर आ कर पानी में छलांग लगा दो । मैं नाव ला रहा हूँ ।
मुझे तैरना भी नहीं आता था । लेकिन जीने की तीव्र चाह ने मुझे छलांग लगाने को प्रेरित किया । मैंने कुछ सोचे बिना पानी में छलांग लगा दी और मल्लाह ने मुझे बचा लिया । वह मुझे दिलासा दे रहा था , लेकिन मैं बार - बार उस और देख रहा था , जहां कुछ देर पहले मैं मौत का सामना कर रहा था । आज भी उस घटना को याद कर के मैं रोमांचित हो उठता हूँ ।